भारत में लगभग 2+ करोड़ से अधिक अनाथ बच्चे हैं।

भारत सरकार द्वारा देश में अनाथ बच्चों की वास्तविक संख्या ज्ञात करने हेतु अब तक कोई समग्र आधिकारिक गणना या नमूना सर्वेक्षण नहीं कराया गया है।.

भारत में अनाथ बच्चों की संख्या श्रीलंका की कुल जनसंख्या के बराबर है।

अनाथ बच्चों के नामकरण अथवा उन्हें धार्मिक विकल्प प्रदान करने के संबंध में कोई स्पष्ट राष्ट्रीय नीति उपलब्ध नहीं है।

20M+

भारत में अनाथ बच्चों की कुल संख्या

117+

जिले जहाँ एक भी अनाथालय नहीं है

10M+

भारत में सड़क पर रहने वाले बच्चे अनाथ हैं

70%

भारतीय बच्चों को कल्याणकारी लाभ प्राप्त होते हैं, अनाथ बच्चे वंचित रह जाते हैं

हमारे बारे में

वीकेस्ट ऑन अर्थ परिवर्तन एवं संवेदना का राष्ट्रीय आह्वान

वीकेस्ट ऑन अर्थ एक सामाजिक पहल है जिसका उद्देश्य भारत में अनाथ बच्चों की स्थिति को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाना है। यह पहल इस विश्वास पर आधारित है कि प्रत्येक बच्चा, चाहे उसकी परिस्थितियाँ कैसी भी हों, समान अधिकार, सम्मान और अवसर का अधिकारी है। इस अभियान की प्रेरणा वर्ष 2001 में गुजरात में आए भूकंप के पश्चात एक शिशु से हुई मुलाकात से प्राप्त हुई। इस अनुभव ने यह स्पष्ट किया कि अनाथ बच्चों की देखभाल, पहचान और पुनर्वास से संबंधित व्यवस्थाओं में अनेक संरचनात्मक कमियाँ विद्यमान हैं। विभिन्न अनाथालयों के निरीक्षण में यह तथ्य सामने आया कि अनेक बच्चों के नाम मनमाने ढंग से निर्धारित किए जाते हैं, उनके पास विधिक पहचान का अभाव होता है, अठारह वर्ष की आयु पूर्ण होने पर उन्हें संस्थागत संरक्षण से बाहर कर दिया जाता है, तथा शिक्षा एवं आजीविका के अवसर सीमित रहते हैं। वीकेस्ट ऑन अर्थ समाज, परिवारों एवं नीति-निर्माताओं से यह अपेक्षा करता है कि प्रत्येक असहाय बच्चे को विधिक पहचान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, जीवन-कौशल प्रशिक्षण तथा सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित किया जाए। यह केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक उत्तरदायित्व भी है।

पुस्तक

वीकेस्ट ऑन अर्थ

ऑर्फन्स ऑफ इंडिया

यह पुस्तक भारत के सबसे संवेदनशील वर्ग—अनाथ बच्चों—की वास्तविक स्थिति को रेखांकित करती है। साक्षात्कार, क्षेत्रीय अध्ययन एवं नीतिगत विश्लेषण के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि अनाथ बच्चों को किन अदृश्य बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसे विधिक पहचान का अभाव, सामाजिक उपेक्षा, तथा शिक्षा एवं आर्थिक अवसरों की कमी।

  • पौलोमी पाविनी लेखिका | वीकेस्ट ऑन अर्थ

पी.आई.एल.

पौलोमी पाविनी शुक्ला, वीकेस्ट ऑन अर्थ: ऑर्फ़न्स ऑफ इंडिया की लेखिका, अनाथ बच्चों के अधिकारों एवं आरक्षण के लिए निरंतर संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने वर्ष 2018 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (P.I.L) दायर की, जिसमें जीवन के अधिकार तथा समानता के अधिकार को सुनिश्चित करने हेतु न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की गई, विशेष रूप से उन बच्चों के लिए जो अनाथ हैं तथा उन सभी “Children in Need of Care and Protection” के लिए।

यह जनहित याचिका अनाथ बच्चों के लिए आरक्षण की मांग करती है — जो किसी भी अन्य पिछड़ा वर्ग या तृतीय लिंग के समान ही अधिकार के पात्र हैं, जिन्हें हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समर्थन प्रदान किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि, “जिन बच्चों के माता-पिता हैं, उन्हें सरकार द्वारा जिन विभिन्न श्रेणियों में वित्तीय, शैक्षिक एवं सशक्तिकरण संबंधी सहायता प्रदान की जाती है, वही या उससे अधिक सहायता अनाथ बच्चों को भी प्रदान की जाए।”

  • पौलोमी की जनहित याचिका, जिसमें अनाथ बच्चों के लिए अधिक बजट एवं सहयोग की मांग की गई थी, उस पर वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किया गया। इसके पश्चात संघ सरकार का अनाथों हेतु बजट Rs. 750 करोड़ (2018-2019) से बढ़ाकर Rs. 1500 करोड़(2019-2020) कर दिया गया।
  • वास्तव में, उनकी जनहित याचिका के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने अनाथ बच्चों को अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत विचार करने की अनुशंसा की। साथ ही, कई राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेश ने अनाथ बच्चों को शैक्षिक आरक्षण एवं वित्तीय सहायता प्रदान करने का विस्तार किया।

न्याय एवं समान अधिकार के अभियान से जुड़ें
इसमें आपका केवल 30 सेकंड का समय लगेगा।
कृपया भारत के अनाथ बच्चों के समर्थन में अपना सहयोग प्रदान करें।

प्रशंसापत्र

सुश्री पौलोमी पाविनी शुक्ला को उनकी पुस्तक “वीकेस्ट ऑन अर्थ” तथा सर्वोच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका के माध्यम से अनाथ बच्चों के पक्ष में किए गए कार्यों के लिए सराहना प्रदान की जाती है।

श्री भूपेश बघेल

मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

किसी राष्ट्र का विकास इस बात से आँका जा सकता है कि वह गरीब एवं असहाय लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है। “वीकेस्ट ऑन अर्थ” एक महत्वपूर्ण कृति है, जो अनाथ एवं वंचित बच्चों की उपेक्षित स्थिति की ओर ध्यान आकर्षित करती है।

श्री जावेद अख्तर

पद्म भूषण

यह पुस्तक विशेष रूप से भारत के किशोर अनाथों की स्थिति पर आधारित एक गहन अध्ययन एवं विश्लेषणात्मक शोध है। यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है।

न्यायमूर्ति वी. एस. सिरपुरकर

न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय

यह समाज के उस वर्ग से संबंधित मुद्दों का उत्कृष्ट एवं व्यापक प्रस्तुतीकरण है, जिसकी आवाज़ अब तक अनसुनी रही है।

डॉ. नरेश त्रेहन

पद्म भूषण, डॉ. बी. सी. राय पुरस्कार अध्यक्ष, मेदांता

सुश्री पौलोमी पाविनी शुक्ला एक स्वप्रेरित युवा हैं, जिन्होंने भारत के अनाथ बच्चों की सहायता के लिए स्वयं को समर्पित किया है। उनका मत है कि माता-पिता से वंचित बच्चे समाज के सबसे कमजोर सदस्य हैं और उन्हें समाज एवं सरकार से अधिकतम समर्थन प्राप्त होना चाहिए।

श्रीमती रीता बहुगुणा जोशी

सांसद एवं महिला एवं बाल कल्याण मंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार

श्रीमती पौलोमी पाविनी शुक्ला का दूरदर्शी शोध कार्य “वीकेस्ट ऑन अर्थ” में अनाथ बच्चों की मौन पीड़ा को उजागर करता है, और यह नीति-निर्माताओं तथा नागरिक समाज दोनों को इस महत्वपूर्ण मानवीय समस्या का सामना करने के लिए प्रेरित करता है। उनका स्पष्ट और सुव्यवस्थित नीतिगत विश्लेषण, जो संवेदनशील केस स्टडीज के साथ प्रस्तुत किया गया है, बाल कल्याण अनुसंधान के क्षेत्र में एक नया मानक स्थापित करता है। लगातार की गई वकालत और सुप्रीम कोर्ट में दायर उनकी याचिका के माध्यम से, उन्होंने राज्य सरकारों को अनाथ बच्चों के लिए समर्पित निधि आवंटित करने और शैक्षिक आरक्षण बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है। लखनऊ निवासी पौलोमी पाविनी शुक्ला की यह अडिग प्रतिबद्धता सच्ची सार्वजनिक सेवा का उदाहरण प्रस्तुत करती है। हमें उम्मीद है कि उनके सतत नेतृत्व से भारत के सबसे कमजोर और संवेदनशील युवाओं के लिए परिवर्तनकारी सुधार लाने में मदद मिलेगी।

श्री केशरी नाथ त्रिपाठी

राज्यपाल, पश्चिम बंगाल एवं बिहार