जनहित याचिका (पी.आई.एल.)

पौलोमी पाविनी शुक्ला, “वीकेस्ट ऑन अर्थ: ऑर्फन्स ऑफ इंडिया” की सह-लेखिका, अनाथ बच्चों के अधिकारों एवं उनके लिए नीतिगत संरक्षण सुनिश्चित करने हेतु सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। वर्ष 2018 में उन्होंने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की। इस याचिका में संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) तथा समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) को प्रभावी रूप से लागू करने हेतु न्यायिक हस्तक्षेप का अनुरोध किया गया, विशेष रूप से उन बच्चों के लिए जो अनाथ हैं तथा “Care and Protection की आवश्यकता वाले बच्चों (Children in Need of Care and Protection)” की श्रेणी में आते हैं।

याचिका में अनाथ बच्चों के लिए शिक्षा एवं रोजगार में आरक्षण संबंधी प्रावधानों पर विचार करने का आग्रह किया गया, ताकि उन्हें अन्य सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से वंचित वर्गों के समान अवसर प्राप्त हो सकें।

याचिका में यह निवेदन किया गया कि जिन बच्चों को पारिवारिक संरक्षण प्राप्त है और जिन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत वित्तीय, शैक्षिक एवं सशक्तिकरण संबंधी सहायता मिलती है, उसी प्रकार की या समुचित सहायता अनाथ बच्चों को भी उपलब्ध कराई जाए।

  • उक्त जनहित याचिका पर वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किया गया। इसके उपरांत, अनाथ बच्चों से संबंधित बजटीय प्रावधानों में वृद्धि की गई, जिसमें वित्तीय वर्ष 2018-19 की तुलना में 2019-20 में अधिक आवंटन सुनिश्चित किया गया।
  • याचिका के पश्चात, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) द्वारा अनाथ बच्चों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अंतर्गत विचार किए जाने की अनुशंसा की गई। इसके अतिरिक्त, कई राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने अनाथ बच्चों के लिए शैक्षिक आरक्षण तथा वित्तीय सहायता योजनाओं का विस्तार किया।

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प्रार्थनाएँ

जनहित याचिका में प्रस्तावित प्रमुख राहतें:

  • अनाथ बच्चों के लिए आरक्षण संबंधी प्रावधानों पर विचार — ताकि उन्हें अन्य सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से वंचित वर्गों, जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग अथवा तृतीय लिंग, के समान अवसर उपलब्ध हो सकें।
  • Tजिन बच्चों को पारिवारिक संरक्षण प्राप्त है तथा जिन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत वित्तीय, शैक्षिक एवं सशक्तिकरण संबंधी सहायता प्रदान की जाती है, उसी प्रकार की अथवा उपयुक्त सहायता अनाथ बच्चों को भी सुनिश्चित की जाए।
  • भारत में “देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों (Children in Need of Care and Protection)” की वास्तविक स्थिति का सटीक आकलन करने हेतु अधिकारिक जनगणना अथवा व्यापक सर्वेक्षण संचालित किया जाए, जिससे नीतिगत निर्णय प्रमाण-आधारित एवं प्रभावी हो सकें।

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